श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  4.18.50 
न चात्मानमहं शोचे न तारां नापि बान्धवान्।
यथा पुत्रं गुणज्येष्ठमङ्गदं कनकाङ्गदम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! मुझे अपने लिए, तारा के लिए और अपने सम्बन्धियों के लिए उतना दुःख नहीं है, जितना कि स्वर्णमय अंगद धारण करने वाले महागुणी पुत्र अंगद के लिए है ॥50॥
 
Lord! I do not feel as sad for myself, for Tara and for my relatives as I do for Angad, the son of great qualities who wears the golden Angad. 50॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd