श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  4.18.46-47 
प्रतिवक्तुं प्रकृष्टे हि नापकृष्टस्तु शक्नुयात्।
यदयुक्तं मया पूर्वं प्रमादाद् वाक्यमप्रियम्॥ ४६॥
तत्रापि खलु मे दोषं कर्तुं नार्हसि राघव।
त्वं हि दृष्टार्थतत्त्वज्ञ: प्रजानां च हिते रत:।
कार्यकारणसिद्धौ च प्रसन्ना बुद्धिरव्यया॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'मुझ जैसा तुच्छ व्यक्ति आप जैसे महान व्यक्ति को उचित उत्तर नहीं दे सकता; अतः मैंने जो पहले असावधानीवश गलत बातें कहीं, उनके लिए आप मुझे दोषी न मानें। रघुनन्दन! आप परम सत्य के सच्चे ज्ञाता हैं और लोगों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। आपकी बुद्धि भ्रम से रहित तथा कारण-कार्य के निर्णय में शुद्ध है।'
 
‘A low-class person like me cannot give a proper answer to a great person like you; therefore, you should not consider me guilty of the wrong things I said earlier due to negligence. Raghunandan! You are the true knower of the ultimate truth and are always ready to help the people. Your intellect is free from confusion and pure in determining the cause and effect.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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