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ramayan 4.18.45: इसके बाद वानरराज ने हाथ जोड़कर श्री रामचन्द्रजी से कहा - 'हे पुरुषश्रेष्ठ! आप जो कुछ कह रहे हैं, वह सर्वथा सत्य है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है॥ 45॥   |   ramayan सर्ग 4.18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.18.45 
प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वर:।
यत् त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत् तथैव न संशय:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद वानरराज ने हाथ जोड़कर श्री रामचन्द्रजी से कहा - 'हे पुरुषश्रेष्ठ! आप जो कुछ कह रहे हैं, वह सर्वथा सत्य है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है॥ 45॥
 
After this, the monkey king folded his hands and said to Shri Ramchandraji - 'O best of men! Whatever you are saying is absolutely correct; there is no doubt about it.॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)