श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.18.44 
एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम्।
न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चय:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जब श्री राम ने ऐसा कहा, तब बालि के हृदय में बड़ी पीड़ा हुई। इससे धर्म का सार निश्चित हो गया। उसने श्री रामचंद्रजी के दोषों का विचार करना छोड़ दिया। 44॥
 
When Shri Ram said this, Vali felt great pain in her heart. This determined the essence of religion. He gave up thinking about Shri Ramchandraji's faults. 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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