श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  4.18.43 
त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं रोषमास्थित:।
विदूषयसि मां धर्मे पितृपैतामहे स्थितम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
तुम धर्म के स्वरूप को न समझकर क्रोध से अभिभूत हो गए हो; इसीलिए मुझ पर, जो अपने पूर्वजों के धर्म में दृढ़ है, निन्दा कर रहे हो ॥ 43॥
 
"You have become overcome by anger, without understanding the nature of Dharma; that is why you are criticising me, who is steadfast in the Dharma of my forefathers." ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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