श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.18.41 
दुर्लभस्य च धर्मस्य जीवितस्य शुभस्य च।
राजानो वानरश्रेष्ठ प्रदातारो न संशय:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हे वानरश्रेष्ठ! राजा दुर्लभ धर्म, जीवन और ऐश्वर्य के दाता हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ 41॥
 
‘O best of the monkeys! Kings are the bestowers of rare Dharma, life and worldly prosperity; there is no doubt about this. ॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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