श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  4.18.40 
यान्ति राजर्षयश्चात्र मृगयां धर्मकोविदा:।
तस्मात् त्वं निहतो युद्धे मया बाणेन वानर।
अयुध्यन् प्रतियुध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
वानर! इस लोक में धर्म को जानने वाले राजा भी शिकार खेलने जाते हैं और नाना प्रकार के पशुओं का वध करते हैं। इसीलिए मैंने युद्ध में तुम्हें अपने बाण का लक्ष्य बनाया है। चाहे तुम मेरे साथ युद्ध करो या न करो, तुम्हारे मारे जाने में कोई अन्तर नहीं पड़ता; क्योंकि तुम शाखा मृग हो (और शिकार करने का अधिकार केवल क्षत्रिय को ही है)।॥40॥
 
Monkey! Even the kings who know Dharma go for hunting in this world and kill various animals. That is why I have made you the target of my arrow in the war. Whether you fought with me or not, it does not make any difference in your being killed; because you are a branch deer (and only a Kshatriya has the right to hunt).॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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