श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  4.18.39 
प्रमत्तानप्रमत्तान् वा नरा मांसाशिनो भृशम्।
विध्यन्ति विमुखांश्चापि न च दोषोऽत्र विद्यते॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
मांसाहारी मनुष्य (क्षत्रिय) उन पशुओं को भी भयंकर चोट पहुँचाते हैं जो सचेत, असावधान अथवा विचलित होकर भागते हैं; परंतु उनके लिए यह शिकार करना कोई दोष नहीं है॥39॥
 
‘Meat-eating men (Kshatriyas) inflict severe injuries on even those animals which are alert, heedless or running away in a distracted manner; but for them this hunting is not a fault.॥ 39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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