श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  4.18.37-38 
न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुंगव।
वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नरा:॥ ३७॥
प्रतिच्छन्नाश्च दृश्याश्च गृह्णन्ति सुबहून् मृगान्।
प्रधावितान् वा वित्रस्तान् विस्रब्धानतिविष्ठितान्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
हे वानरश्रेष्ठ! मुझे इस कृत्य का न तो कोई शोक है और न ही कोई खेद। मनुष्य (राजा आदि) बड़े-बड़े जाल बिछाकर, जाल बिछाकर तथा नाना प्रकार के छल-कपट (गुप्त गड्ढे आदि बनाकर) करके छिपे रहते हैं और आगे आकर बहुत से हिरणों को पकड़ लेते हैं; चाहे वे डरकर भाग जाएँ या विश्वास करके बहुत निकट बैठे हों॥ 38॥
 
‘O best of the monkeys! I have neither sorrow nor regret for this act. Men (kings etc.) by laying large nets and spreading traps and by using various types of deceits (constructing secret pits etc.) remain hidden and come forward and catch many deer; whether they run away in fear or are sitting very close in confidence.॥ 38॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd