श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.18.35 
तदलं परितापेन धर्मत: परिकल्पित:।
वधो वानरशार्दूल न वयं स्ववशे स्थिता:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
अतः हे वानरश्रेष्ठ! पश्चाताप करने से कोई लाभ नहीं है। तुम धर्मानुसार मारे गए हो; क्योंकि हम अपने वश में नहीं हैं (हम शास्त्रों के अधीन हैं)॥35॥
 
‘Therefore, O best of the monkeys! There is no use in repenting. You have been killed in accordance with the Dharma (righteousness); because we are not in control of ourselves (we are subject to the scriptures).॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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