श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.18.33 
आर्येण मम मान्धात्रा व्यसनं घोरमीप्सितम्।
श्रमणेन कृते पापे यथा पापं कृतं त्वया॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जो पाप तुमने किया है, वही पाप प्राचीन काल में एक श्रमण ने किया था। मेरे पूर्वज महाराज मान्धाता ने उसे शास्त्रानुसार अत्यन्त कठोर दण्ड दिया था॥ 33॥
 
The same sin that you have committed was committed by a Shramana in ancient times. My ancestor Maharaja Mandhaata gave him a very severe punishment, which was required according to the scriptures.॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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