श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.18.30 
शक्यं त्वयापि तत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता।
श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ।
गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
यदि तुम राजा होकर धर्म का पालन करते, तो तुम भी वही करते जो मैंने किया है। मनु ने राजा के सदाचार का वर्णन करने वाले दो श्लोक कहे हैं, जो स्मृतियों में सुने गए हैं और जिन्हें धर्मपालन में कुशल पुरुषों ने आदरपूर्वक स्वीकार किया है। उनके अनुसार इस समय मेरा आचरण ऐसा ही है (वे श्लोक इस प्रकार हैं—)॥30॥
 
‘Had you, being a king, followed Dharma, you would have done the same thing that I have done. Manu has said two verses which explain the good conduct of a king, which are heard in the Smritis and which have been accepted with respect by those who are skilled in following Dharma. According to them, this is my conduct at this time (those verses are as follows—)॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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