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ramayan 4.18.29: धर्मपरायण पुरुष के लिए अपने मित्र की सहायता करना ही धर्म है; अतः तुम्हें जो दण्ड दिया गया है, वह धर्म के अनुसार है। तुम्हें उसे ऐसा ही समझना चाहिए॥29॥   |   ramayan सर्ग 4.18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.18.29 
सर्वथा धर्म इत्येव द्रष्टव्यस्तव निग्रह:।
वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता॥ २९॥
 
 
अनुवाद
धर्मपरायण पुरुष के लिए अपने मित्र की सहायता करना ही धर्म है; अतः तुम्हें जो दण्ड दिया गया है, वह धर्म के अनुसार है। तुम्हें उसे ऐसा ही समझना चाहिए॥29॥
 
‘For a person who has an eye on Dharma, helping his friend is considered Dharma; therefore, the punishment given to you is in accordance with Dharma. You should consider it as such.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)