श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.18.25 
वयं तु भरतादेशावधिं कृत्वा हरीश्वर।
त्वद्विधान् भिन्नमर्यादान् निग्रहीतुं व्यवस्थिता:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हरिश्वर! भरत की आज्ञा को प्रमाण मानकर हम लोग धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले तुम जैसे लोगों को दण्ड देने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं॥25॥
 
Harishwar! Taking Bharat's orders as proof, we are always ready to punish people like you who violate the limits of religion. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)