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ramayan 4.18.23-24h: हमारे राजा भरत हैं। हम तो केवल उनकी आज्ञा का पालन करने वाले हैं। आप धर्म से पतित हैं, अतः आपकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है?॥ 23 1/2॥   |   ramayan सर्ग 4.18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  4.18.23-24h 
भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिन:॥ २३॥
त्वं च धर्मादतिक्रान्त: कथं शक्यमुपेक्षितुम्।
 
 
अनुवाद
हमारे राजा भरत हैं। हम तो केवल उनकी आज्ञा का पालन करने वाले हैं। आप धर्म से पतित हैं, अतः आपकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है?॥ 23 1/2॥
 
Our king is Bharat. We are only followers of his orders. You have fallen from Dharma; therefore how could you be ignored?॥ 23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)