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ramayan 4.18.22-23h: मैं कुलीन कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूँ, इसलिए मैं तुम्हारे इस पाप को क्षमा नहीं कर सकता। यदि कोई पुरुष अपनी पुत्री, बहिन या छोटे भाई की स्त्री के प्रति काम-भावना से जाता है, तो उसका वध करना ही उसके लिए उचित दण्ड माना गया है।   |   ramayan सर्ग 4.18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  4.18.22-23h 
न च ते मर्षये पापं क्षत्रियोऽहं कुलोद‍्गत:।
औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य य:॥ २२॥
प्रचरेत नर: कामात् तस्य दण्डो वध: स्मृत:।
 
 
अनुवाद
मैं कुलीन कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूँ, इसलिए मैं तुम्हारे इस पाप को क्षमा नहीं कर सकता। यदि कोई पुरुष अपनी पुत्री, बहिन या छोटे भाई की स्त्री के प्रति काम-भावना से जाता है, तो उसका वध करना ही उसके लिए उचित दण्ड माना गया है।
 
I am a Kshatriya born in a noble family; therefore I cannot forgive your sin. If a man goes to his daughter, sister or younger brother's wife with lust, killing him is considered the appropriate punishment for him. 22 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)