श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.18.21 
नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुष:।
दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे वानरराज! जो व्यक्ति सामाजिक रीति-रिवाजों से भ्रष्ट हो गया है और समाज के विरुद्ध आचरण करता है, उसे रोकने या सही मार्ग पर लाने के लिए दंड के अलावा मुझे कोई अन्य उपाय नहीं दिखता।
 
O King of Monkeys! I see no other way to stop or bring back on the right path a person who is corrupt from social customs and acts against the society, except by punishment.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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