श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.18.20 
तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर।
भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादित:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वानर! इस प्रकार तुम धर्म से विमुख होकर स्वेच्छाचारी हो गए हो और अपने भाई की पत्नी से प्रेम करने लगे हो। तुम्हारे इसी अपराध के कारण तुम्हें यह दण्ड दिया गया है।
 
Monkey! In this way you have deviated from Dharma and become arbitrary and you embrace your brother's wife. Because of this crime of yours you have been given this punishment.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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