श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.18.17 
अहं तु व्यक्ततामस्य वचनस्य ब्रवीमि ते।
नहि मां केवलं रोषात् त्वं विगर्हितुमर्हसि॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मैंने जो कुछ कहा है, उसका अर्थ मैं तुम्हें समझाता हूँ। तुम्हें क्रोध करके मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिए॥17॥
 
I will explain to you the meaning of what I have said here. You should not criticize me out of anger.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)