श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.18.16 
चपलश्चपलै: सार्धं वानरैरकृतात्मभि:।
जात्यन्ध इव जात्यन्धैर्मन्त्रयन् प्रेक्षसे नु किम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
आप स्वयं चंचल हैं और चंचलचित्त, अजेय वानरों के साथ रहते हैं। जैसे जन्मांध मनुष्य जन्मांधों से मार्ग पूछता है, वैसे ही आप उन चंचल वानरों से परामर्श करते हैं। फिर आप धर्म का चिंतन कैसे कर सकते हैं? आप उसका स्वरूप कैसे समझ सकते हैं?॥16॥
 
‘You yourself are fickle and live with the fickle-minded, unconquered monkeys. So just as a man born blind asks directions from those born blind, you consult with those fickle monkeys. Then how can you think about Dharma? How can you understand its nature?॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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