श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.18.15 
सूक्ष्म: परमदुर्ज्ञेय: सतां धर्म: प्लवङ्गम।
हृदिस्थ: सर्वभूतानामात्मा वेद शुभाशुभम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वानर! सज्जनों का धर्म सूक्ष्म है, उसे जानना अत्यंत कठिन है - उसे समझना अत्यंत कठिन है। जो परम पुरुष सब प्राणियों के अंतःकरण में स्थित है, वही सबके भले-बुरे को जानता है॥ 15॥
 
Monkey! The religion of gentlemen is subtle, it is extremely difficult to know - it is extremely difficult to understand it. The Supreme Being who resides in the conscience of all beings, only He knows the good and bad of all.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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