श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.18.14 
यवीयानात्मन: पुत्र: शिष्यश्चापि गुणोदित:।
पुत्रवत्ते त्रयश्चिन्त्या धर्मश्चैवात्र कारणम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार छोटा भाई, पुत्र और गुणवान शिष्य - ये तीनों पुत्र के समान माने जाने योग्य हैं। इनके प्रति ऐसी भावना रखने का कारण धर्म ही है ॥14॥
 
Similarly, younger brother, son and a virtuous disciple - these three are worthy of being considered equal to a son. Religion is the reason for having such feelings towards them. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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