श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.18.12 
त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हित:।
कामतन्त्रप्रधानश्च न स्थितो राजवर्त्मनि॥ १२॥
 
 
अनुवाद
तूने अपने जीवन में काम को प्रधानता दी थी। तू राजपथ पर कभी दृढ़ नहीं रहा। तूने सदैव धर्म में बाधा डाली और अपने दुष्कर्मों के कारण सज्जनों द्वारा सदैव निन्दा की गई॥12॥
 
‘You had given priority to lust in your life. You never remained steadfast on the royal path. You always obstructed Dharma and due to your bad deeds, you were always criticized by the good men.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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