श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.18.11 
ते वयं मार्गविभ्रष्टं स्वधर्मे परमे स्थिता:।
भरताज्ञां पुरस्कृत्य निगृह्णीमो यथाविधि॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हम सब लोग अपने उत्तम धर्म में दृढ़ होकर भरत की आज्ञा को ध्यान में रखते हुए धर्म के मार्ग से भटकने वालों को विधिपूर्वक दण्ड देते हैं॥ 11॥
 
We all, firmly established in our excellent Dharma, keeping in mind the command of Bharata, punish in a lawful manner those who stray from the path of Dharma.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)