| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना » श्लोक 48 |
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| | | | श्लोक 4.17.48  | त्वयादृश्येन तु रणे निहतोऽहं दुरासद:।
प्रसुप्त: पन्नगेनैव नर: पापवशं गत:॥ ४८॥ | | | | | | अनुवाद | | जैसे सोते हुए मनुष्य को साँप डस लेता है और वह मर जाता है, वैसे ही तूने युद्धस्थल में छिपकर मुझ अजेय योद्धा को मार डाला है और ऐसा करके तू पाप का भागी हुआ है॥ 48॥ | | | | Just as a snake bites a sleeping man and he dies, similarly you have killed me, an invincible warrior, on the battlefield by remaining hidden and by doing so you have become a part of sin.॥ 48॥ | | ✨ ai-generated | | |
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