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श्लोक 4.17.34  |
न तेऽस्त्यपचितिर्धर्मे नार्थे बुद्धिरवस्थिता।
इन्द्रियै: कामवृत्त: सन् कृष्यसे मनुजेश्वर॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| हे मनुष्यों! तुम धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, न ही तुम्हारी बुद्धि धन के पीछे लगी रहती है। हे मनुष्यों के स्वामी! तुम स्वेच्छाचारी हो। इसीलिए तुम्हारी इन्द्रियाँ तुम्हें जहाँ-तहाँ घसीटती रहती हैं॥ 34॥ |
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| ‘You have no respect for religion, nor is your intellect stable in the pursuit of wealth. O Lord of men! You are willful. That is why your senses drag you anywhere.॥ 34॥ |
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