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ramayan 4.17.32: नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह - ये राजा के कर्तव्य हैं, परन्तु इनके प्रयोग के लिए भिन्न-भिन्न अवसर हैं (अकारण इनका प्रयोग करना उचित नहीं है)। राजाओं को निरंकुश नहीं होना चाहिए॥ 32॥   |   ramayan सर्ग 4.17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.17.32 
नयश्च विनयश्चोभौ निग्रहानुग्रहावपि।
राजवृत्तिरसंकीर्णा न नृपा: कामवृत्तय:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह - ये राजा के कर्तव्य हैं, परन्तु इनके प्रयोग के लिए भिन्न-भिन्न अवसर हैं (अकारण इनका प्रयोग करना उचित नहीं है)। राजाओं को निरंकुश नहीं होना चाहिए॥ 32॥
 
‘Ethics and politeness, punishment and grace – these are the duties of a king, but there are different occasions for their use (it is not right to use them without reason). Kings should not be autocratic.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)