श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.17.30 
वयं वनचरा राम मृगा मूलफलाशिन:।
एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुषस्त्वं नरेश्वर॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
‘नरेश्वर राम! हम लोग वन में रहने वाले, फल-मूल खाने वाले मृग हैं। यह हमारा स्वभाव है; परंतु आप तो मनुष्य हैं (इसलिए हमारे और आपके बीच वैर का कोई कारण नहीं है)॥30॥
 
‘Nareshwar Ram! We are forest-dwelling deer who eat fruits and roots. This is our nature; but you are a man (human) (therefore there is no reason for enmity between us and you).॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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