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श्लोक 4.17.25  |
फलमूलाशनं नित्यं वानरं वनगोचरम्।
मामिहाप्रतियुध्यन्तमन्येन च समागतम्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| मैं तो सदैव फल-मूल खाने वाला और वन में विचरण करने वाला वानर हूँ। मैं यहाँ तुमसे नहीं, किसी और से युद्ध कर रहा था। फिर तुमने बिना किसी दोष के मुझे क्यों मारा?॥ 25॥ |
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| ‘I am a monkey who always eats fruits and roots and roams in the forest. I was not fighting with you here, I was fighting with someone else. Then why did you kill me without any fault?॥ 25॥ |
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