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ramayan 4.17.25: मैं तो सदैव फल-मूल खाने वाला और वन में विचरण करने वाला वानर हूँ। मैं यहाँ तुमसे नहीं, किसी और से युद्ध कर रहा था। फिर तुमने बिना किसी दोष के मुझे क्यों मारा?॥ 25॥   |   ramayan सर्ग 4.17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.17.25 
फलमूलाशनं नित्यं वानरं वनगोचरम्।
मामिहाप्रतियुध्यन्तमन्येन च समागतम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मैं तो सदैव फल-मूल खाने वाला और वन में विचरण करने वाला वानर हूँ। मैं यहाँ तुमसे नहीं, किसी और से युद्ध कर रहा था। फिर तुमने बिना किसी दोष के मुझे क्यों मारा?॥ 25॥
 
‘I am a monkey who always eats fruits and roots and roams in the forest. I was not fighting with you here, I was fighting with someone else. Then why did you kill me without any fault?॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)