श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.17.23 
सतां वेषधरं पापं प्रच्छन्नमिव पावकम्।
नाहं त्वामभिजानामि धर्मच्छद्माभिसंवृतम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
तूने साधु का वेश धारण किया है, परन्तु तू पापी है। राख से ढकी हुई अग्नि के समान तेरा वास्तविक स्वरूप साधु के वेश में छिपा है। मैं यह नहीं जानता था कि तूने धर्म का आवरण केवल लोगों को ठगने के लिए धारण किया है॥ 23॥
 
‘You have assumed the guise of a saint, but you are a sinner. Like a fire covered with ashes, your true form is hidden in the guise of a saint. I did not know that you have taken the cover of religion only to deceive people.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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