श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 17: वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.17.15 
स भूमावल्पतेजोऽसुर्निहतो नष्टचेतन:।
अर्थसंहितया वाचा गर्वितं रणगर्वितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अब उसमें शक्ति और प्राण थोड़े ही बचे थे। वह बाण से घायल होकर भूमि पर पड़ा था और उसकी गति धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही थी। युद्ध में वीरता और पराक्रम दिखाने वाले अभिमानी श्री राम से वह कटु वचन बोलने लगा-॥15॥
 
Now he had little energy and life left. He was lying on the ground wounded by an arrow and his movements were slowly fading away. He started speaking in harsh words to the proud Shri Ram who had displayed his valour and bravery in the war -॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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