श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 16: वाली का तारा को डाँटकर लौटाना और सुग्रीव से जूझना तथा श्रीराम के बाण से घायल होकर पृथ्वी पर गिरना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.16.5 
न च कार्यो विषादस्ते राघवं प्रति मत्कृते।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च कथं पापं करिष्यति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी का स्मरण करके भी तुम्हें मेरे लिए दुःखी नहीं होना चाहिए। क्योंकि वे धर्म के ज्ञाता हैं और उचित-उचित को समझते हैं। अतः वे पाप कैसे कर सकते हैं?
 
You should not be sad for me even after thinking about Shri Ramchandraji. Because he is a knower of religion and understands what is right and right. So how can he commit a sin?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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