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श्लोक 4.16.10  |
शापितासि मम प्राणैर्निवर्तस्व जनेन च।
अलं जित्वा निवर्तिष्ये तमहं भ्रातरं रणे॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘अब मैं अपने प्राणों की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम इन स्त्रियों के साथ लौट जाओ। अब और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है, मैं युद्ध में अपने भाई को हराकर ही लौटूँगा।’॥10॥ |
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| ‘Now I swear on my life that you should return with these women. Now there is no need to say more, I will return after defeating my brother in the war.’॥ 10॥ |
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