श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 15: सुग्रीव की गर्जना सुनकर वाली का युद्ध के लिये निकलना और तारा का उसे रोककर सुग्रीव और श्रीराम के साथ मैत्री कर लेने के लिये समझाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.15.28 
सुग्रीवो विपुलग्रीवो महाबन्धुर्मतस्तव।
भ्रातृसौहृदमालम्ब्य नान्या गतिरिहास्ति ते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
"मैं मानता हूँ कि बलवान सुग्रीव ही तुम्हारा परम प्रिय भाई है। इस समय तुम्हारे लिए भ्रातृ-प्रेम का आश्रय लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है॥ 28॥
 
"I believe that the strong-necked Sugreeva is your most loving brother. At this time there is no other option for you except to take recourse to brotherly love.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)