श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 15: सुग्रीव की गर्जना सुनकर वाली का युद्ध के लिये निकलना और तारा का उसे रोककर सुग्रीव और श्रीराम के साथ मैत्री कर लेने के लिये समझाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.15.12 
दर्पश्च व्यवसायश्च यादृशस्तस्य नर्दत:।
निनादस्य च संरम्भो नैतदल्पं हि कारणम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
इस समय गर्जना करते हुए सुग्रीव जो गर्व और चेष्टा दिखा रहा है तथा उसकी गर्जना में जो उत्साह प्रकट हो रहा है, वह किसी छोटे कारण से नहीं हो रहा होगा॥12॥
 
The pride and effort that Sugreeva shows while roaring at this time and the excitement that is evident in his roar must not be due to any small reason.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)