श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 14: वाली-वध के लिये श्रीराम का आश्वासन पाकर सुग्रीव की विकट गर्जना  »  श्लोक 5-7h
 
 
श्लोक  4.14.5-7h 
दृष्ट्वा रामं क्रियादक्षं सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत्।
हरिवागुरया व्याप्तां तप्तकाञ्चनतोरणाम्॥ ५॥
प्राप्ता: स्म ध्वजयन्त्राढॺां किष्किन्धां वालिन: पुरीम्।
प्रतिज्ञा या कृता वीर त्वया वालिवधे पुरा॥ ६॥
सफलां कुरु तां क्षिप्रं लतां काल इवागत:।
 
 
अनुवाद
कार्यकुशल श्री रामचन्द्रजी को देखकर सुग्रीव बोले, 'प्रभो! यह वालि की किष्किन्धा नगरी तपे हुए सोने के द्वार से सुशोभित है। इसके चारों ओर वानरों का जाल फैला हुआ है और यह ध्वजाओं तथा यन्त्रों से परिपूर्ण है। हम सब इस नगरी में पहुँच गए हैं। वीर! आपने पहले वालि को मारने की जो प्रतिज्ञा की थी, अब उसे शीघ्र ही सफल बनाइए। जैसे अनुकूल समय आने पर लताएँ फल-फूलों से लद जाती हैं।'॥5-6 1/2॥
 
Looking at the efficient Shri Ramchandra, Sugreeva said, 'Lord! This Kishkinda city of Vali is decorated with a city gate made of heated gold. It has a network of monkeys spread all around and it is full of flags and machines. We all have reached this city. Brave! The vow you had made earlier to kill Vali, now make it successful soon. Just like the favorable time that comes makes the creeper full of fruits and flowers.'॥ 5-6 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)