श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 13: श्रीराम आदि का मार्ग में वृक्षों, विविधजन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रम का दूर से दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरी में पहुँचना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  4.13.9 
मृदुशष्पाङ्कुराहारान्निर्भयान् वनगोचरान्।
चरत: सर्वत: पश्यन् स्थलीषु हरिणान् स्थितान्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
सब स्थानों पर वनवासी मृग, कोमल हरी घास की कोंपलों पर चरते हुए, कहीं निर्भय होकर चरते और कहीं खड़े दिखाई देते थे। (श्रीराम आदि सभी लोग यह सब देखते हुए किष्किन्धा की ओर बढ़ रहे थे।)
 
In all the places, the forest-dwelling deer, feeding on the sprouts of soft green grass, were seen grazing fearlessly at some places and standing at other places (Sri Rama and the others were proceeding towards Kishkinda while watching all this).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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