vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड
»
सर्ग 13: श्रीराम आदि का मार्ग में वृक्षों, विविधजन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रम का दूर से दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरी में पहुँचना
»
श्लोक 25
श्लोक
4.13.25
कुरु प्रणामं धर्मात्मंस्तेषामुद्दिश्य राघव।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रयत: संहताञ्जलि:॥ २५॥
अनुवाद
हे धर्मात्मा रघुनन्दन! एकाग्र मन से हाथ जोड़कर अपने भाई लक्ष्मण सहित उन मुनियों को प्रणाम करो॥ 25॥
O Dharmatma Raghunandan! With your mind focused, with folded hands, along with your brother Lakshmana, bow down to those sages.॥ 25॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd