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ramayan 4.13.23: यहाँ आहवनीय आदि तीन प्रकार की अग्नियाँ भी प्रज्वलित हैं। यहाँ कबूतर के शरीर के समान धूसर रंग का गाढ़ा धुआँ उठता हुआ दिखाई देता है, जो वृक्षों की चोटियों को आवृत करता हुआ प्रतीत होता है॥23॥   |   ramayan सर्ग 4.13: श्रीराम आदि का मार्ग में वृक्षों, विविधजन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रम का दूर से दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरी में पहुँचना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 13: श्रीराम आदि का मार्ग में वृक्षों, विविधजन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रम का दूर से दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरी में पहुँचना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.13.23 
त्रेताग्नयोऽपि दीप्यन्ते धूमो ह्येष प्रदृश्यते।
वेष्टयन्निव वृक्षाग्रान् कपोताङ्गारुणो घन:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
यहाँ आहवनीय आदि तीन प्रकार की अग्नियाँ भी प्रज्वलित हैं। यहाँ कबूतर के शरीर के समान धूसर रंग का गाढ़ा धुआँ उठता हुआ दिखाई देता है, जो वृक्षों की चोटियों को आवृत करता हुआ प्रतीत होता है॥23॥
 
‘Here the three types of fires like Ahavaniya etc. are also lit. Here thick smoke of grey colour like the body of a pigeon is seen rising, which seems to be enveloping the tops of the trees.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)