श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 13: श्रीराम आदि का मार्ग में वृक्षों, विविधजन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रम का दूर से दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरी में पहुँचना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.13.22 
विभूषणरवाश्चात्र श्रूयन्ते सकलाक्षरा:।
तूर्यगीतस्वनश्चापि गन्धो दिव्यश्च राघव॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'रघुनंदन! यहाँ मधुर स्वरों के साथ-साथ अलंकारों की झंकार भी सुनाई देती है। वाद्यों और गीतों की मधुर ध्वनि भी कानों तक पहुँचती है और दिव्य सुगंध का भी अनुभव होता है॥ 22॥
 
‘Raghunandan! Here, along with sweet voices, the tinkling of ornaments is also heard. The sweet sound of musical instruments and songs also reaches the ears and a divine fragrance is also experienced.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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