श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 13: श्रीराम आदि का मार्ग में वृक्षों, विविधजन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रम का दूर से दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरी में पहुँचना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.13.15 
किमेतज्ज्ञातुमिच्छामि सखे कौतूहलं मम।
कौतूहलापनयनं कर्तुमिच्छाम्यहं त्वया॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘मित्र! मैं जानना चाहता हूँ कि यह कौन-सा वन है। मुझे इसके विषय में बड़ी जिज्ञासा है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी जिज्ञासा शांत करो।’॥15॥
 
‘Friend! I want to know which forest this is. I am very curious about it. I want you to satisfy my curiosity.'॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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