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श्लोक 4.13.15  |
किमेतज्ज्ञातुमिच्छामि सखे कौतूहलं मम।
कौतूहलापनयनं कर्तुमिच्छाम्यहं त्वया॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मित्र! मैं जानना चाहता हूँ कि यह कौन-सा वन है। मुझे इसके विषय में बड़ी जिज्ञासा है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी जिज्ञासा शांत करो।’॥15॥ |
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| ‘Friend! I want to know which forest this is. I am very curious about it. I want you to satisfy my curiosity.'॥ 15॥ |
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