श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 12: सुग्रीव का किष्किन्धा में आकर वाली को ललकारना और युद्ध में पराजित होना, वहाँ श्रीराम का पहचान के लिये गजपुष्पीलता डालकर उन्हें पुनः युद्ध के लिये भेजना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.12.41 
स तया शुशुभे श्रीमाँल्लतया कण्ठसक्तया।
मालयेव बलाकानां ससंध्य इव तोयद:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
उस लता को गले में धारण किए हुए श्री सुग्रीव शब्दों की पंक्तियों से सुशोभित संध्याकालीन मेघ के समान शोभा पा रहे थे ॥41॥
 
With that creeper around his neck, Shri Sugreeva looked like an evening cloud decorated with the lines of the words. ॥41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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