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ramayan 4.11.78: हे मित्र! मुझे तुम परम प्रिय मित्र लगे हो। पुरुषसिंह! तुम मेरे लिए हिमालय के समान हो और मैंने तुम्हारी शरण ली है। (इसलिए अब मुझे निर्भय हो जाना चाहिए)॥78॥   |   ramayan सर्ग 4.11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  4.11.78 
उपलब्धं च मे श्लाघ्यं सन्मित्रं मित्रवत्सल।
त्वामहं पुरुषव्याघ्र हिमवन्तमिवाश्रित:॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
हे मित्र! मुझे तुम परम प्रिय मित्र लगे हो। पुरुषसिंह! तुम मेरे लिए हिमालय के समान हो और मैंने तुम्हारी शरण ली है। (इसलिए अब मुझे निर्भय हो जाना चाहिए)॥78॥
 
‘Friendly! I have found you to be the most desirable friend. Purushsingh! You are like the Himalayas to me and I have taken shelter in you. (Therefore I should be fearless now)॥ 78॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)