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ramayan 4.11.64: हे नर! तब से उस शाप से भयभीत वालि न तो इस महान पर्वत ऋष्यमूक के स्थानों में प्रवेश करना चाहता है और न ही इस पर्वत को देखना चाहता है।   |   ramayan सर्ग 4.11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  4.11.64 
तत: शापभयाद् भीतो ऋष्यमूकं महागिरिम्।
प्रवेष्टुं नेच्छति हरिर्द्रष्टुं वापि नरेश्वर॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
हे नर! तब से उस शाप से भयभीत वालि न तो इस महान पर्वत ऋष्यमूक के स्थानों में प्रवेश करना चाहता है और न ही इस पर्वत को देखना चाहता है।
 
Lord Nara! Since then, Vali, scared of that curse, neither wants to enter the places of this great mountain Rishyamuka nor does he want to see this mountain.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)