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ramayan 4.11.63: 'परन्तु महर्षि ने उनका आदर नहीं किया। वे चुपचाप अपने आश्रम लौट गए। शाप मिलने के भय से वे बहुत व्याकुल हो गए।' 63.   |   ramayan सर्ग 4.11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  4.11.63 
महर्षिस्तमनादृत्य प्रविवेशाश्रमं प्रति।
शापधारणभीतस्तु वाली विह्वलतां गत:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
'परन्तु महर्षि ने उनका आदर नहीं किया। वे चुपचाप अपने आश्रम लौट गए। शाप मिलने के भय से वे बहुत व्याकुल हो गए।' 63.
 
‘But the Maharshi did not respect him. He quietly went back to his hermitage. Fearing that he would receive the curse, he became very upset. 63.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)