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ramayan 4.11.17: "धर्मवत्सल दुन्दुभे! मुझे कष्ट न दें। मैं युद्ध में कुशल नहीं हूँ। मैं तो केवल तपस्वियों का निवासस्थान हूँ।"   |   ramayan सर्ग 4.11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.11.17 
क्लेष्टुमर्हसि मां न त्वं दुन्दुभे धर्मवत्सल।
रणकर्मस्वकुशलस्तपस्विशरणो ह्यहम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
"धर्मवत्सल दुन्दुभे! मुझे कष्ट न दें। मैं युद्ध में कुशल नहीं हूँ। मैं तो केवल तपस्वियों का निवासस्थान हूँ।"
 
"Dharmavatsala Dundubhe! Do not trouble me. I am not skilled in warfare. I am only the abode of ascetics."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)