श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना  » 
 
 
सर्ग 11: वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना
 
श्लोक 1:  श्री रामजी के हर्षित और पुरुषार्थ को बढ़ाने वाले वचन सुनकर सुग्रीव ने उनके प्रति आदर प्रकट किया और श्री रघुनाथजी की इस प्रकार स्तुति की॥1॥
 
श्लोक 2:  प्रभु! आपके बाण प्रज्वलित, तीक्ष्ण और भेदने वाले हैं। यदि आप क्रोधित हो जाएँ, तो इनसे प्रलयकाल के सूर्य के समान सम्पूर्ण लोकों का नाश कर सकते हैं। इसमें संशय नहीं है॥ 2॥
 
श्लोक 3:  परन्तु वालिका में जो भी प्रयत्न, शक्ति और धैर्य हो, उसे ध्यानपूर्वक सुनो। तत्पश्चात् जैसा उचित समझो वैसा करो॥3॥
 
श्लोक 4:  वालि सूर्योदय से पहले ही पश्चिमी समुद्र से पूर्वी समुद्र की ओर और दक्षिणी समुद्र से उत्तरी समुद्र की ओर यात्रा करता है; फिर भी वह थकता नहीं है॥4॥
 
श्लोक 5:  वह महाबली पर्वतों की चोटियों पर चढ़ जाता है और बड़े-बड़े शिखरों को बलपूर्वक उठाकर ऊपर फेंक देता है और फिर उन्हें अपने हाथों से थाम लेता है॥5॥
 
श्लोक 6:  वालि ने अपना बल दिखाते हुए वन में अनेक प्रकार के मजबूत वृक्षों को बड़े जोर से तोड़ डाला ॥6॥
 
श्लोक 7:  प्राचीन काल में दुंदुभि नाम का एक राक्षस था, जो भैंसे का रूप धारण किए हुए था। वह कैलाश पर्वत जितना ऊँचा प्रतीत होता था। महाबली दुंदुभि के शरीर में हज़ार हाथियों का बल था।
 
श्लोक 8:  वह विशाल, दुष्ट दैत्य अपने बल के अभिमान में पूर्ण होकर, प्राप्त वरदान से मोहित होकर नदियों के स्वामी समुद्र के पास गया।
 
श्लोक 9:  विशाल लहरों से भरे हुए और रत्नों से भरे हुए समुद्र को तुच्छ जानकर उसे पार करके दुन्दुभि ने उसके अधिष्ठाता देवता से कहा - 'मुझे अपने साथ युद्ध करने का अवसर दीजिए।'॥9॥
 
श्लोक 10:  राजन! उस समय महान् पराक्रमी और धर्मात्मा समुद्र ने उस काल-प्रेरित दैत्य से इस प्रकार कहा- 10॥
 
श्लोक 11:  "हे वीर योद्धा विशेषज्ञ! मैं तुम्हें युद्ध का अवसर देने में असमर्थ हूँ। मैं तुम्हें उस व्यक्ति का नाम बता रहा हूँ जो तुम्हें युद्ध का अवसर देगा। सुनो।"
 
श्लोक 12-13:  जो विशाल वन पर्वतों का राजा और भगवान शंकर का ससुर है, तपस्वियों का सबसे बड़ा आश्रय है और जो संसार में हिमवान नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ से जल के बड़े-बड़े स्रोत प्रकट हुए हैं और जहाँ अनेक गुफाएँ और झरने हैं, वही गिरिराज हिमालय तुम्हारे साथ युद्ध करने में समर्थ है और तुम्हें अतुलनीय प्रेम दे सकता है॥12-13॥
 
श्लोक 14-15:  यह सुनकर दैत्यों में श्रेष्ठ दुन्दुभि समुद्र से भयभीत होकर धनुष से छूटे हुए बाण के समान तुरन्त हिमालय के वन में जा पहुँचा और गर्जना करता हुआ हाथियों के आकार के बड़े-बड़े श्वेत शिलाखंडों को बार-बार भूमि पर गिराने लगा।
 
श्लोक 16:  तब श्वेत मेघ के समान सौम्य स्वभाव वाले हिमवान वहाँ प्रकट हुए। उनकी आकृति सुख देने वाली थी। वे अपने शिखर पर खड़े होकर बोले - 16॥
 
श्लोक 17:  "धर्मवत्सल दुन्दुभे! मुझे कष्ट न दें। मैं युद्ध में कुशल नहीं हूँ। मैं तो केवल तपस्वियों का निवासस्थान हूँ।"
 
श्लोक 18:  बुद्धिमान गिरिराज हिमालय के ये वचन सुनकर दुन्दुभि के नेत्र क्रोध से लाल हो गए और वह इस प्रकार बोला- ॥18॥
 
श्लोक 19:  यदि तुम मेरे भय से युद्ध करने में असमर्थ हो अथवा युद्ध करने से विमुख हो, तो उस वीर पुरुष का नाम बताओ जो मुझ युद्ध की इच्छा रखने वाले को अपने साथ युद्ध करने का अवसर दे सके॥19॥
 
श्लोक 20:  यह सुनकर, वार्तालाप में निपुण पुण्यात्मा हिमवान ने उस महान् राक्षस से, जिसके विरुद्ध पहले किसी ने कोई योद्धा नहीं बताया था, क्रोधित होकर कहा:
 
श्लोक 21:  हे महाबली दैत्यराज! एक अत्यन्त तेजस्वी और तेजस्वी वानर है, जिसका नाम वालि है। वह देवराज इन्द्र का पुत्र है और वह अतुलनीय शोभा से परिपूर्ण किष्किन्धा नामक नगरी में रहता है।॥ 21॥
 
श्लोक 22:  "वह अत्यंत बुद्धिमान और युद्धकला में निपुण है। केवल वही तुमसे युद्ध करने में समर्थ है। जिस प्रकार इन्द्र ने नमुचि को युद्ध करने का अवसर दिया था, उसी प्रकार वह तुमसे द्वन्द्वयुद्ध भी कर सकता है।"
 
श्लोक 23:  यदि तुम यहाँ युद्ध करना चाहते हो, तो शीघ्र चले जाओ; क्योंकि वालि के लिए किसी भी शत्रु की चुनौती का सामना करना अत्यन्त कठिन है। वह युद्ध में सदैव वीरता ही दिखाता है। ॥23॥
 
श्लोक 24:  हिमवान् के वचन सुनकर दुन्दुभि क्रोध में भरकर तुरन्त ही वालि की किष्किन्धा नगरी में पहुँचा॥ 24॥
 
श्लोक 25:  उसने भैंसे का रूप धारण कर लिया था। उसके सींग बहुत तीखे थे। वह बहुत डरावना लग रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे बरसात के मौसम में पानी से भरा कोई विशाल बादल आसमान को ढक रहा हो।
 
श्लोक 26:  वह महापराक्रमी दुन्दुभि किष्किन्धापुरी के द्वार पर आकर पृथ्वी को कम्पित करने वाला ऐसा घोर गर्जना करने लगा, मानो दुन्दुभि घोर शब्द कर रहा हो ॥26॥
 
श्लोक 27:  उसने चारों ओर के वृक्षों को तोड़ डाला, खुरों से धरती खोद डाली और अभिमानपूर्वक अपने सींगों से नगर के द्वार को खरोंचकर युद्ध के लिए तैयार हो गया॥ 27॥
 
श्लोक 28:  उस समय वालि अन्तःपुर में था। उस राक्षस की गर्जना सुनकर वह क्रोधित हो उठा और स्त्रियों से घिरा हुआ नगर से बाहर निकल आया, जैसे चन्द्रमा तारों से घिरा हुआ हो॥ 28॥
 
श्लोक 29:  सम्पूर्ण वनवासी वानरों के राजा वालि ने वहाँ उस दुन्दुभिस से स्पष्ट अक्षरों और श्लोकों से युक्त सीमित वाणी में कहा - 29॥
 
श्लोक 30:  "हे महाबली दुन्दुभे! मैं तुम्हें भली-भाँति जानता हूँ। तुम इस नगर के द्वार को रोककर क्यों गर्जना कर रहे हो? अपने प्राण बचाओ।" ॥30॥
 
श्लोक 31:  बुद्धिमान वानरराज के ये वचन सुनकर दुन्दुभि के नेत्र क्रोध से लाल हो गए और वह उनसे इस प्रकार बोला -॥31॥
 
श्लोक 32:  "वीर, तुम्हें औरतों के सामने ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। मुझे लड़ने का मौका दो, तब मैं तुम्हारी ताकत समझूंगी।"
 
श्लोक 33:  "या बन्दर! मैं आज रात को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखूँगा। तुम सूर्योदय तक मुझसे समय ले सकते हो और इच्छानुसार यौन सुख भोग सकते हो।"
 
श्लोक 34:  "बंदरों को गले लगाओ और जिसे चाहो, जो चाहो दे दो; तुम सभी वानरों के राजा हो, है ना? अपने दोस्तों से मिलो और उनकी सलाह मानो।" 34.
 
श्लोक 35:  "किष्किन्धापुरी को अच्छी तरह देखो। अपने जैसे ही किसी पुत्र को इस नगर का राजा बनाओ और जी भरकर स्त्रियों का संग करो। इसके बाद मैं तुम्हारा घमंड चूर-चूर कर दूँगा।" 35.
 
श्लोक 36:  जो मदिरा के नशे में चूर, मदमस्त (असावधान), युद्ध से भागे हुए, निहत्थे, दुर्बल, तुम्हारे समान स्त्रियों से घिरे हुए और मदमस्त पुरुष को मारता है, वह संसार में गर्भ-हत्यारा कहलाता है॥36॥
 
श्लोक 37:  यह सुनकर वालि ने मन्द स्वर में मुस्कुराकर तारा आदि समस्त स्त्रियों को दूर धकेल दिया और राक्षसराज से क्रोधित होकर बोला-॥37॥
 
श्लोक 38:  "यदि तुम युद्ध के लिए निर्भय होकर खड़े हो, तो यह मत सोचना कि यह मनुष्य मधु पीकर मतवाला हो गया है। मेरे इस मतवालेपन को एक विशेष औषधि समझो, जिसका सेवन योद्धा युद्धभूमि में अपना उत्साह बढ़ाने के लिए करते हैं।"
 
श्लोक 39:  ऐसा कहकर क्रोधित वालि ने अपने पिता इन्द्र द्वारा दी गई विजयप्रद स्वर्ण माला अपने गले में डाल ली और युद्ध के लिए खड़ा हो गया।
 
श्लोक 40:  महाकपि-पुरुष ने पर्वताकार दुन्दुभि के दोनों सींग पकड़ लिये और जोर से गर्जना करते हुए उसे बार-बार घुमाया।
 
श्लोक 41:  फिर उसने उसे जोर से भूमि पर पटक दिया और बड़े जोर से गर्जना की। भूमि पर पटकते ही उसके दोनों कानों से रक्त की धाराएँ बहने लगीं॥ 41॥
 
श्लोक 42:  क्रोध से भरकर तथा एक-दूसरे को परास्त करने की इच्छा से दुंदुभि और वालि के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया।
 
श्लोक 43:  उस समय इन्द्र के समान शक्तिशाली दुन्दुभिपर ने घूँसों, लातों, घुटनों, शिलाओं और वृक्षों से आक्रमण करना आरम्भ कर दिया।
 
श्लोक 44:  उस रणभूमि में जब वानर और राक्षस योद्धा एक दूसरे पर आक्रमण कर रहे थे, तब राक्षस का बल घटने लगा और इन्द्रपुत्र का बल बढ़ने लगा ॥44॥
 
श्लोक 45:  'दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। उस समय वालि ने दुंदुभि को उठाकर भूमि पर पटक दिया और उसे अपने शरीर से दबा भी दिया, जिससे दुंदुभि चूर-चूर हो गई।
 
श्लोक 46:  ‘गिरते समय उसके शरीर के समस्त रोमछिद्रों से बहुत-सा रक्त बहने लगा। वह महाबाहु राक्षस पृथ्वी पर गिरकर मर गया॥46॥
 
श्लोक 47:  जब वह प्राण त्यागकर अचेत हो गया, तब तीव्र गति से चलने वाले राक्षस ने उसे दोनों हाथों से उठाकर सामान्य गति से एक योजन दूर फेंक दिया।
 
श्लोक 48:  उस राक्षस के मुख से बड़े वेग से निकली हुई रक्त की बहुत सी बूंदें वायु के साथ उड़कर मतंग ऋषि के आश्रम पर गिरीं॥48॥
 
श्लोक 49:  हे महामुनि! वहाँ पड़े हुए रक्त की बूंदों को देखकर मतंगे ऋषि क्रोधित हो गए और सोचने लगे कि 'यह कौन है जिसने यहाँ रक्त छिड़का है?'॥49॥
 
श्लोक 50:  "यह दुष्ट आत्मा, दुष्ट-मन, अजेय और मूर्ख व्यक्ति कौन है जिसने अचानक मेरे शरीर को रक्त से स्पर्श करा दिया?"
 
श्लोक 51:  यह कहकर ऋषि मातंगे बाहर गए और चारों ओर देखा तो उन्हें एक पर्वताकार भैंसा जमीन पर मृत पड़ा दिखाई दिया।
 
श्लोक 52:  उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से जान लिया कि यह काम बंदर का है, अतः उन्होंने उस बंदर को शाप दे दिया जिसने शव फेंका था॥ 52॥
 
श्लोक 53:  जिसने रक्त छिड़ककर इस मेरे निवासस्थान वन को अपवित्र किया है, वह आज से इस वन में प्रवेश न करे। यदि वह इसमें प्रवेश करेगा, तो मारा जाएगा॥ 53॥
 
श्लोक 54-55h:  "वह दुष्ट मनुष्य, जिसने इस राक्षस के शरीर को यहाँ फेंक दिया है और इन वृक्षों को तोड़ डाला है, यदि मेरे आश्रम के चारों ओर एक योजन की भूमि पर पैर रखेगा, तो अवश्य ही उसके प्राण चले जाएँगे ॥ 54 1/2॥
 
श्लोक 55-56:  "उस स्त्री के जो भी सचिव मेरे इस वन में रह रहे हैं, वे अब यह स्थान छोड़ दें। मेरी आज्ञा सुनकर वे प्रसन्नतापूर्वक चले जाएँ। यदि वे यहाँ रहेंगे, तो मैं उन्हें भी अवश्य ही शाप दूँगा।" 55-56.
 
श्लोक 57:  "मैंने अपने इस वन की सदैव पुत्र के समान रक्षा की है। जो लोग यहाँ रहकर इसके पत्ते और अंकुर नष्ट करेंगे तथा इसके फल और मूल को नष्ट करेंगे, वे अवश्य ही शापित होंगे। 57.
 
श्लोक 58:  "आज उन सबके आने, जाने या रुकने का आखिरी दिन है - मैं उन्हें पूरे दिन की छुट्टी देता हूँ। कल से जो भी बंदर यहाँ मेरी नज़र में आएगा, वह हज़ारों सालों के लिए पत्थर बन जाएगा।"
 
श्लोक 59:  ऋषि के ये वचन सुनकर सभी वानर मतंग वन से चले गए। उन्हें देखकर वालि ने पूछा-
 
श्लोक 60:  "मतंग वन में रहने वाले तुम सभी बंदर मेरे पास क्यों आये हो? क्या वनवासी कुशल मंगल हैं?"
 
श्लोक 61:  तब सब वानरों ने स्वर्णमालाधारी वालि को अपने आने का कारण बताया और उसे जो शाप दिया गया था, वह भी कह सुनाया॥61॥
 
श्लोक 62:  वानरों की ये बातें सुनकर वालि मतंगे ऋषि के पास गया और हाथ जोड़कर क्षमा याचना की।
 
श्लोक 63:  'परन्तु महर्षि ने उनका आदर नहीं किया। वे चुपचाप अपने आश्रम लौट गए। शाप मिलने के भय से वे बहुत व्याकुल हो गए।' 63.
 
श्लोक 64:  हे नर! तब से उस शाप से भयभीत वालि न तो इस महान पर्वत ऋष्यमूक के स्थानों में प्रवेश करना चाहता है और न ही इस पर्वत को देखना चाहता है।
 
श्लोक 65:  श्री राम! मैं अपने मन्त्रियों सहित इस महान् वन में शोकरहित होकर विचरण करता हूँ।॥65॥
 
श्लोक 66:  'यह दुंदुभि की हड्डियों का ढेर है, जो किसी महान पर्वत शिखर के समान प्रतीत होता है। बल के अभिमान से युक्त वालि ने दुंदुभि के शरीर को इतनी दूर फेंक दिया था।' 66।
 
श्लोक 67:  ये सात वर्ष की आयु के विशाल एवं घने वृक्ष हैं, जो अनेक उत्तम शाखाओं से सुशोभित हैं। वालि इनमें से प्रत्येक को जोर से हिलाकर पत्तों से रहित कर सकता है। 67।
 
श्लोक 68:  श्री राम! मैंने बालि का अतुलनीय पराक्रम प्रकट कर दिया है। हे पुरुषों के स्वामी! आप युद्ध में उस बालि को कैसे मार सकेंगे?॥68॥
 
श्लोक 69:  सुग्रीव के ऐसा कहने पर लक्ष्मण खूब हँसे। हँसते हुए उन्होंने कहा- 'कौन-सा कार्य पूरा करने पर तुम्हें विश्वास हो जाएगा कि श्री रामचन्द्रजी बाली को मार सकेंगे?'
 
श्लोक 70-71:  तब सुग्रीव ने उनसे कहा, 'पूर्वकाल में वालि ने इन सातों सालवृक्षों को एक-एक करके अनेक बार छेदा था। अतः यदि श्री रामचन्द्रजी भी इनमें से किसी एक वृक्ष को एक ही बाण से छेद दें, तो उसका पराक्रम देखकर मुझे विश्वास हो जाएगा कि वालि मारा गया है।' 70-71।
 
श्लोक 72:  लक्ष्मण! यदि यह भैंसारूपी प्राणी दुन्दुभि की हड्डी को एक ही पैर से उठाकर दो सौ धनुष की दूरी तक बलपूर्वक फेंक दे, तो भी मैं मान लूँगा कि इसके हाथों से वालि मारा जा सकता है॥ 72॥
 
श्लोक 73:  श्री राम से, जिनकी आँखें किंचित लाल थीं, ऐसा कहकर सुग्रीव कुछ देर तक गहन विचार में मग्न रहे। इसके बाद वे ककुत्स्थ कुल के रत्न श्री राम से पुनः बोले-
 
श्लोक 74:  'वालि वीर है और उसे स्वयं अपनी वीरता पर गर्व है। उसका बल और साहस प्रसिद्ध है। वह शक्तिशाली वानर आज तक युद्धों में कभी पराजित नहीं हुआ।' 74.
 
श्लोक 75:  उसके ऐसे-ऐसे कर्म देखे जा रहे हैं, जो देवताओं के लिए भी कठिन हैं और उन्हीं का विचार करके मैंने इस ऋष्यमूक पर्वत की शरण ली है।
 
श्लोक 76:  'वानरराज वालि को परास्त करना अन्यों के लिए असंभव है। उन पर आक्रमण या अपमान भी नहीं किया जा सकता। वे शत्रु की चुनौती का सामना नहीं कर सकते। जब मैं उनकी शक्ति का विचार करता हूँ, तो मैं एक क्षण के लिए भी इस ऋष्यमूक पर्वत को छोड़ नहीं पाता।' 76.
 
श्लोक 77:  ये हनुमान्‌ आदि मेरे सचिव मुझ पर बहुत स्नेह करते हैं। इनके साथ रहते हुए भी मैं इस विशाल वन में चिन्ता और आशंका से भरा हुआ विचरण करता हूँ॥ 77॥
 
श्लोक 78:  हे मित्र! मुझे तुम परम प्रिय मित्र लगे हो। पुरुषसिंह! तुम मेरे लिए हिमालय के समान हो और मैंने तुम्हारी शरण ली है। (इसलिए अब मुझे निर्भय हो जाना चाहिए)॥78॥
 
श्लोक 79:  किन्तु हे रघुनन्दनपुत्र! मैं उस शक्तिशाली दुष्ट भाई के पराक्रम को जानता हूँ, किन्तु युद्धभूमि में तुम्हारा पराक्रम मैंने नहीं देखा।
 
श्लोक 80:  प्रभु! मैं आपकी तुलना बालि से नहीं करता। मैं न तो आपको डराता हूँ, न ही आपका अपमान करता हूँ। बालि के भयंकर कर्मों ने ही मेरे हृदय में भय उत्पन्न किया है। 80.
 
श्लोक 81:  रघुनन्दन! आपके वचन मेरे लिए निश्चय ही प्रामाणिक हैं, विश्वसनीय हैं; क्योंकि आपका धैर्य और दिव्य रूप आदि आपके उत्तम तेज को दर्शाते हैं, जैसे राख से ढकी हुई अग्नि।
 
श्लोक 82:  महात्मा सुग्रीव की यह बात सुनकर भगवान् श्री राम पहले तो मुस्कुराये, फिर वानर के प्रश्न का उत्तर देते हुए उससे बोले-॥82॥
 
श्लोक 83:  वानर! यदि इस समय तुम्हें हमारी वीरता पर विश्वास नहीं है, तो युद्ध के समय हम तुम्हें विश्वास दिला देंगे। ॥8 3॥
 
श्लोक 84-85:  ऐसा कहकर और सुग्रीव को सान्त्वना देकर, लक्ष्मण के बड़े भाई, पराक्रमी श्री रघुनाथ ने खेल-खेल में दुंदुभि के शरीर को अपने पैर के अँगूठे से लटका दिया और उसी अँगूठे से राक्षस के सूखे कंकाल को दस योजन दूर फेंक दिया।
 
श्लोक 86:  अपने शरीर को फेंका हुआ देखकर सुग्रीव ने लक्ष्मण और वानरों के सामने जलते हुए सूर्य के समान तेजस्वी वीर श्री रामजी से पुनः ये अर्थपूर्ण वचन कहे-॥86॥
 
श्लोक 87:  मित्र! मेरा भाई वालि उस समय युद्ध से थका हुआ और मदोन्मत्त था और दुंदुभि का शरीर रक्त से लथपथ, मांस से भरा हुआ और नया था। इसी अवस्था में उसने पूर्वकाल में इस शरीर को त्याग दिया था।
 
श्लोक 88:  परन्तु हे रघुनन्दन! इस समय यह मांस रहित होने के कारण तिनके के समान हल्का हो गया है और आपने हर्ष और उत्साह के साथ इसे फेंक दिया है।
 
श्लोक 89:  अतः हे श्री राम! इस शव को फेंक देने पर भी यह निश्चय नहीं हो सकता कि आपका बल अधिक है या उनका; क्योंकि वह शव गीला था और यह सूखा है। इन दोनों अवस्थाओं में बहुत बड़ा अन्तर है। 89।
 
श्लोक 90:  "पिताजी! आपके और उनके बल के विषय में अभी भी वही संदेह बना हुआ है। अब इस एक साल वृक्ष को काटने पर दोनों के बल का पता चल जाएगा।"
 
श्लोक 91:  'तुम्हारा यह धनुष हाथी की फैली हुई सूँड़ के समान विशाल है। इस पर डोरी चढ़ाकर इसे हाथी के कान तक खींचो और साल के वृक्ष पर निशाना साधकर एक विशाल बाण चलाओ।'
 
श्लोक 92:  इसमें कोई संदेह नहीं है कि आपके द्वारा छोड़ा गया बाण इस सालवृक्ष को छेद देगा । हे राजन ! अब सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है । मैं आपकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आप मुझे प्रसन्न करने वाला यह कार्य अवश्य करेंगे ॥ 92॥
 
श्लोक 93:  जैसे समस्त ज्योतियों में सूर्यदेव सर्वदा श्रेष्ठ हैं, जैसे महान पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है और जैसे समस्त चौपायों में सिंह श्रेष्ठ है, वैसे ही पराक्रम की दृष्टि से तुम समस्त मनुष्यों में श्रेष्ठ हो॥॥93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)