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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 10: भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 4-5h
 
 
श्लोक  4.10.4-5h 
आर्तस्तत्र बिलद्वारि स्थित: संवत्सरं नृप।
दृष्ट्वा च शोणितं द्वारि बिलाच्चापि समुत्थितम्॥ ४॥
शोकसंविग्नहृदयो भृशं व्याकुलितेन्द्रिय:।
 
 
अनुवाद
"वानरराज! मैं बहुत दुखी होकर एक वर्ष तक उस छेद के द्वार पर खड़ा रहा। उसके बाद, छेद के अंदर से रक्त की धारा निकली। द्वार पर उस रक्त को देखकर मेरा हृदय शोक से व्याकुल हो गया और मेरी सारी इन्द्रियाँ अत्यंत व्याकुल हो गईं। 4 1/2।
 
"Monkey King! I was very sad and stood at the door of that hole for a year. After that, a stream of blood came out from inside the hole. Seeing that blood at the door, my heart was agitated with grief and all my senses became extremely restless. 4 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)