श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 10: भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.10.35 
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हर्षपौरुषवर्धनम्।
सुग्रीव: परमप्रीत: सुमहद्वाक्यमब्रवीत्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
श्री राम का यह कथन हर्षदायक और पुरुषार्थ को बढ़ाने वाला था। यह सुनकर सुग्रीव अत्यंत प्रसन्न हुए। फिर वे बहुत महत्त्वपूर्ण बात कहने लगे॥35॥
 
This statement of Shri Ram was joyous and increased manly efforts. Hearing this, Sugreeva was very pleased. Then he started saying something very important. ॥ 35॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे दशम: सर्ग:॥ १०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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