श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 10: भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.10.31 
एवमुक्त: स तेजस्वी धर्मज्ञो धर्मसंहितम्।
वचनं वक्तुमारेभे सुग्रीवं प्रहसन्निव॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जब सुग्रीव ने ऐसा कहा, तब धर्म के ज्ञाता परम तेजस्वी श्री रामजी हँसते हुए उससे धर्म से पूर्ण ये वचन कहने लगे -॥31॥
 
When Sugreeva said this, the most illustrious Sri Rama, the knower of Dharma, smilingly began speaking to him the following words full of Dharma -॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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